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फरेबियों को तो हम, अपना समझ बैठे !

फरेबियों को तो हम, अपना समझ बैठे !
हक़ीक़त को तो हम, सपना समझ बैठे !
मुकद्दर कहें कि वक़्त की शरारत कहें,
कि पत्थर को हम, ज़िन्दगी समझ बैठे !
दुनिया की चालों से न हुए बावस्ता हम,
और उनको हम, अपना खुदा समझ बैठे !
दाद देते हैं हम खुद की अक्ल को “मिश्र”,
कि क़ातिलों को हम, फरिश्ता समझ बैठे !

शांती स्वरूप मिश्र

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