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Hindi Poetry On Mother By Munawwar Rana – सिरफिरे लोग हमें दुश्मने जाँ कहते हैं

सिरफिरे लोग हमें दुश्मने जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं

मुझे बस इसलिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह खुशग्वार लगती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

किसी को घर मिला हिस्से में या दुकाँ आई
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती

ये ऐसा कर्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटू मेरी माँ सजदे में रहती है

खाने की चीज़ें माँ ने जो भेजी थीं गाँव से
बासी भी हो गई हैं तो लज्जत वही रही

बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है बेटा मज़े में है

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है,
मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है।

मंज़िल न दे चराग न दे हौसला तो दे
तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे
मैंने ये कब कहा के मेरे हक में हो जवाब
लेकिन खामोश क्यूँ है तू कोई फैसला तो दे
बरसों मैं तेरे नाम पे खाता रहा फरेब
मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे
बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार
लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे

6 Comments

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  1. bahot hi achhi poem Hai sir_____Aap aaj ke era ke Shandar Shayar Ho___Aap ki um’r Badhti Rahe Duaa karenge__KHUDA HAFIZ

  2. yeh poem dil ko touch kr gai sir

    innsah aalah…………. aap aur asi poem likh te rahe

  3. Dil ko chhu gyi…mast

  4. Herat touching shayri
    i like it
    munawwar rana is the best poet in his life and for all the people
    i like you munawwar rana

  5. Munawwar Rana साहब मेरी माँ के रहने पर मैंने आपकी कविता पढ़ी थी,आपकी वो लाइन बहुत अच्छी लगी थी ,किसी के हिस्से में मकाँ आई ,किसी के हिस्से में दुकाँ आईऔर मैं सबसे छोटा था,मेरे हिस्से माँ आई ,ये लाइन मेरे जीवन में बहुत सटिक बैठी और मैं ये लाइन अपनी माँ को सुनाया करता था और मैं माँ से कहता था कि मुझे दुनिया की सबसे बड़ी दौलत मिल गयी,आज माँ नहीं है तो लगता है मै कंगाल हो गया हूँ ।।

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