कंकरीली राहों की कसक, आज भी ताज़ा है


कंकरीली राहों की कसक, आज भी ताज़ा है
गरम रेत की वो तपिश, आज भी ताज़ा है
फटी बिबाइयों का वो कशकता खामोश दर्द,
और कांटों की वो चुभन, आज भी ताज़ा है
रातों में जग कर अपनी फसलों का पहरा,
और माघ की वो ठिठुरन, आज भी ताज़ा है
जेठ में लू की लपकती भयानक वो लपटें,
और पशीने की वो लथपथ, आज भी ताज़ा है
बौराये आमों का तालाब के किनारे बगीचा,
कोकिल का वो मधु कलरव, आज भी ताज़ा है
मुद्दत गुज़र गयी कमल दल देखे बिना हमें,
मगर दिल में उनकी महक, आज भी ताज़ा है
वर्षों गुज़र गए घर से बेघर हुए हमको यारो,
मगर दिल में गांव की हवा, आज भी ताज़ा है

शांती स्वरूप मिश्र

फरेबियों को तो हम, अपना समझ बैठे !

फरेबियों को तो हम, अपना समझ बैठे !
हक़ीक़त को तो हम, सपना समझ बैठे !
मुकद्दर कहें कि वक़्त की शरारत कहें,
कि पत्थर को हम, ज़िन्दगी समझ बैठे !
दुनिया की चालों से न हुए बावस्ता हम,
और उनको हम, अपना खुदा समझ बैठे !
दाद देते हैं हम खुद की अक्ल को “मिश्र”,
कि क़ातिलों को हम, फरिश्ता समझ बैठे !

शांती स्वरूप मिश्र

क्या क्या खोया क्या पाया, हमको कुछ भी याद नहीं !

क्या क्या खोया क्या पाया, हमको कुछ भी याद नहीं !
किसने अरमानों को कुचला, हमको कुछ भी याद नहीं !

उतर गए थे हम तो यूं ही इस दुनिया के सागर में,
किसने बीच भंवर में छोड़ा, ये हमको कुछ भी याद नहीं !

इस कदर हुए कुछ ग़ाफ़िल हम इस परदेस में आकर,
कब कैसे अपना घर हम भूले, हमको कुछ भी याद नहीं !

किसे बताएं किस किस ने लूटा चैन हमारे जीवन का,
इस दिल को किसने कैसे नोंचा, हमको कुछ भी याद नहीं !

जो उलझ गए थे ताने बाने कभी न सुलझा पाये हम,
कहाँ कहाँ पर गांठ पड़ गयीं, ये हमको कुछ भी याद नहीं !

शांती स्वरूप मिश्र

तमन्नाओं को लोग, पूरा होने नहीं देते !

तमन्नाओं को लोग, पूरा होने नहीं देते !
खुशियों के बीज वो, कभी बोने नहीं देते !

क्यों कर रुलाता है सब से ज्यादा वही,
जिसको कभी भी हम, यूं रोने नहीं देते !

हमतो टूटने के लिए बेक़रार हैं लेकिन,
दुनिया वाले फिर से, एक होने नहीं देते !

ज़फ़ाओं का तूफ़ान मचलता है जब कभी,
तो बर्बादियों के निशाँ, हमें सोने नहीं देते !

बुरा बनता है वही जो लुटाता है सब कुछ,
खुश हैं वो जो, अठन्नी भी खोने नहीं देते !

शांती स्वरूप मिश्र

कुछ कहने की कुछ सुनने की, हिम्मत न रही अब !

कुछ कहने की कुछ सुनने की, हिम्मत न रही अब !
यूं हर किसी से सर खपाने की, हिम्मत न रही अब !

हम भी बदल गए हैं तो वो भी न रहे बिल्कुल वैसे,
सच तो ये है कि उनको भी, मेरी ज़रुरत न रही अब !

अब फ़ुरसत ही नहीं कि कभी उनको याद कर लें,
ख़ैर उनको भी हमारे जैसों से, मोहब्बत न रही अब !

देखना था जो तमाशा सो देख लिया इस जमाने ने,
मैं तो भूल गया सब कुछ, कोई नफ़रत न रही अब !

सोचता हूँ कि जी लूँ कुछ पल और ज़िंदगी के “मिश्र”,
यूं भी वक़्त का मुंह चिढ़ाने की, फ़ितरत न रही अब !

शांती स्वरूप मिश्र